जीव विज्ञान : एक सामान्य परिचय (Biology : A General Introduction)

जीव विज्ञान : एक सामान्य परिचय (Biology : A General Introduction)

 जीव विज्ञान की परिभाषा (Definition of Biology)

जीव विज्ञान (Biology) विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत समस्त जीवधारियों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। जीवधारियों की उत्पत्ति, उनका विकास, क्रियाकलाप, उनकी रचना, वातावरण का उन पर प्रभाव तथा उनकी पारस्परिक क्रियाएँ और यहाँ तक की उनकी मृत्यु सभी जीव विज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किए जाने वाले विषय हैं । 

जीव-विज्ञान को विज्ञान की एक शाखा के रूप में स्थापित करने का श्रेय अरस्तू को जाता है। उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में खास तौर से जीव-विज्ञान के क्षेत्र में काफी अध्ययन किया। इस कारण अरस्तू को जीव-विज्ञान का जनक कहा जाता है। लेकिन जीवधारियों के अध्ययन के लिए “बायोलॉजी' शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1801 ई. में लैमार्क (फ्रांस) और ट्रेविरनस (जर्मनी) नामक दो वैज्ञानिकों ने किया था। 

वनस्पति विज्ञान तथा प्राणिविज्ञान जीव विज्ञान की दो शाखाएँ हैं । वनस्पति विज्ञान के अन्तर्गत वनस्पतियों अर्थात्‌ पेड़-पीधों का अध्ययन किया जाता है। प्राणि विज्ञान के अन्तर्गत जन्तुओं तथा उसके क्रियाकलापों का अध्ययन किया जाता है। थियोफ्रेस्टस नामक वनस्पति शास्त्री ने अपनी पुस्तक Historia Plantarum में 500 किस्म के पौधों का वर्णन किया है। थियोफ्रेस्टस को वनस्पति विज्ञान का जनक कहा जाता है। अरस्तू ने अपनी पुस्तक Historia Animalium में लगभग 500 जन्तुओं का वर्णन किया है। अरस्तू को जन्तु विज्ञान का जनक कहा जाता है।


जीवधारियों का वर्गीकरण (Classification of Organisms)


जीवधारियों के वर्गीकरण को वैज्ञानिक आधार जॉन रे नामक वैज्ञानिक ने प्रदान किया, लेकिन जीवधारियों के आधुनिक वर्गीकरण में सबसे प्रमुख योगदान स्वीडिश वैज्ञानिक कैरोलस लीनियस (1708 - 1778 ई.) का है । लीनियस ने अपनी पुस्तकों जेनेरा प्लाण्टेरम (Genera Plantarum), सिस्टेमा नेचुरी (Systema Naturae), क्लासेस प्लाण्टेरम (Classes Plantarum) एवं फिलासोफिया बॉटेनिका (Philosophia Botanica) में जीवधारियों के वर्गीकरण पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला | इन्होंने अपनी पुस्तक Systema Naturae में सम्पूर्ण जीवधारियों को दो जगतों (Kingdoms) - पादप जगत (Plant kingdom) तथा जन्तु जगत (Animal kingdom) में विभाजित किया। इससे जो वर्गीकरण की प्रणाली शुरू हुई उसी से आधुनिक वर्गीकरण प्रणाली की नींव पड़ी; इसलिए कैरोलस लीनियस (Carolus Linnaeus) को वर्गिकी का पिता (Father of Taxonomy) कहा जाता है।
परम्परागत द्वि-जगत वर्गीकरण का स्थान अन्ततः आर० एच० हट्टेकर (R. H. Whittaker) द्वारा सन्‌ 1969 ई० में प्रस्तावित 5-जगत प्रणाली ने ले लिया। इसके अनुसार समस्त जीवों को निम्नलिखित पाँच जगत (Kingdom) में वर्गीकृत किया गया - (1) मोनेरा (Monera), (2) प्रोटिस्टा (Protista), (3) पादप (Plantae), (4) कवक (Fungi) तथा (5) एनीमेलिया (Animalia)।
(1) मोनेरा (Monera) - इस जगत में सभी प्रोकैरियोटिक जीव अर्थात्‌ जीवाणु, सायनोबैक्टीरिया तथा आर्कीबैक्टीरिया सम्मिलित किए गए हैं। तन्तुमय जीवाणु भी इसी जगत के भाग हैं।
(2) प्रोटिस्टा (Protista) - इस जगत में विविध प्रकार के एककोशिकीय प्राय: जलीय यूकैरियोटिक जीव सम्मिलित किए गए हैं। पादप व जन्तु के बीच स्थित यूग्लीना इसी जगत में है। यह दो प्रकार की जीवन पद्धति प्रदर्शित करती है - सूर्या के प्रकाश में स्वपोषित एवं प्रकाश के अभाव में इतर पोषित।
(3) पादप (Plantae) - इस जगत में प्रायः वे सभी रंगीन, बहुकोशिकीय, प्रकाश संश्लेषी उत्पादक जीव सम्मिलित हैं । शैवाल, मॉस, पुष्पीय तथा अपुष्पीय बीजीय पौधे इसी जगत के अंग हैं।
(4) कवक (Fungi) - इस जगत में वे यूकैरियोटिक तथा परपोषित जीवधारी सम्मिलित किए गए हैं, जिनमें अवशोषण द्वारा पोषण होता है। ये सभी इतरपोषी होते हैं। ये परजीवी अथवा मृतोपजीवी होते हैं। इसकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।
(5) एनीमेलिया (Animalia) - इस जगत में सभी बहुकोशिकीय जन्तु समभोजी यूकैरियोटिक, उपभोक्ता जीव सम्मिलित किए गए हैं। इनको मेटाजोआ भी कहते हैं। हाइड्रा, जैलीफिश, कृमि, सितारा मछली, सरीसृप, उभयचर, पक्षी तथा स्तनधारी जीव इसी जगत के अंग हैं ।


जीवों के नामकरण की द्विनाम पद्धति (Binary nomenclature of organisms)


सन्‌ 1753 में कैरोलस लीनियस ने जीवों के नामकरण की द्विनाम पद्धति को प्रचलित किया। इस पद्धति के अनुसार, प्रत्येक जीवधारी का नाम लैटिन भाषा के दो शब्दों से मिलकर बनता है। पहला शब्द वंश नाम (Generic name) तथा दूसरा शब्द जाति नाम (Species name) कहलाता है | वंश तथा जाति नामों के बाद उस वर्गिकीविद (वैज्ञानिक) का नाम लिखा जाता है, जिसने सबसे पहले उस जाति को खोजा या जिसने इस जाति को सबसे पहले वर्तमान नाम प्रदान किया, जैसे - मानव का वैज्ञानिक नाम होमो सैपियन्स लिन (Homo sapiens Linn) है। वास्तव में होमो (Homo) उस वंश का नाम है, जिसकी एक जाति सैपियन्स (sapiens) है। लिन (Linn) वास्तव में लीनियस (Linnaeus) शब्द का संक्षितत रूप है। इसका अर्थ यह है कि सबसे पहले लीनियस ने इस जाति को होमो सैपियन्स नाम से पुकारा है ।


जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के जनक (Father of various branches of biology)

जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के जनक
क्रम संख्या शाखा जनक
1 जीव विज्ञान अरस्तू
2 सुजननिकी एफ. गाल्टन
3 प्रतिरक्षा विज्ञान एडवर्ड जैनर
4 आधुनिक आनुवंशिकी टी. एच. मॉर्गन
5 पादप शारीरिकी एन. गिऊ
6 चिकित्साशास्त्र हीप्पोक्रेट्स
7 उत्परिवर्तन सिद्धांत ह्यूगो डी ब्राइज
8 कवक विज्ञान माइकेली
9 जीवाणु विज्ञान ल्यूवेनहॉक
10 भारतीय कवक विज्ञान ई. जे. बुट्लर
11 भारतीय परिस्थितिकी आर. मिश्रा
12 आधुनिक भ्रूण विज्ञान वॉन बेयर
13 जीवाश्मिकी लियोनार्डो डी विन्सी
14 आधुनिक वनस्पति विज्ञान कैरोलस लीनियस
15 आनुवंशिकी ग्रेगर जॉन मेण्डल
16 कोशिका विज्ञान रॉबर्ट हुक
17 वर्गिकी कैरोलस लीनियस
18 ऊतक विज्ञान मार्सेलो मैल्पीगी
19 तुलनात्मक शारीरिकी जी. क्यूवियर
20 पादप कार्ययिकी स्टीफन हेल्‍स
21 सूक्ष्म जीव विज्ञान लुईस पाश्चर
22 भारतीय ब्रायोलॉजी आर. एम. कश्यप
23 भारतीय शैवाल विज्ञान एम. ओ. ए. आयंगर

जीव विज्ञान FAQs

यहाँ जीव विज्ञान में अक्सर पूछे जाने वाले कुछ प्रश्न (FAQs) संक्षिप्त उत्तरों के साथ दिए गए हैं:

सामान्य जीव विज्ञान FAQs

प्रश्न 1. जीवन की मूल इकाई क्या है ?

उत्तर - कोशिका सभी जीवित जीवों में जीवन की मूल इकाई है। प्रत्येक जीवित जीव कोशिकाओं से बना होता है। कोशिकाएँ चयापचय, वृद्धि और प्रजनन जैसे आवश्यक कार्य करती हैं, जिससे वे जीवन की मूल इकाई बन जाती हैं।

प्रश्न 2. जीवन के तीन डोमेन क्या हैं ?

उत्तर - बैक्टीरिया, आर्किया और यूकेरिया तीन डोमेन हैं जो सभी जीवित जीवों को वर्गीकृत करते हैं। जीवों को आनुवंशिक और सेलुलर अंतर के आधार पर इन तीन व्यापक डोमेन में वर्गीकृत किया जाता है। यह वर्गीकरण प्रजातियों के बीच विकासवादी संबंधों को समझने में मदद करता है।

प्रश्न 3. डीएनए क्या है ?

उत्तर - डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (डीएनए) वह अणु है जो जीवित जीवों में आनुवंशिक जानकारी ले जाता है। डीएनए एक जीव के लिए आनुवंशिक खाका संग्रहीत करता है और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पारित वंशानुगत जानकारी के लिए जिम्मेदार होता है।

प्रश्न 4. माइटोसिस और मेयोसिस के बीच क्या अंतर है?

उत्तर - माइटोसिस कोशिका विभाजन की प्रक्रिया है जिसके परिणामस्वरूप दो समान संतति कोशिकाएँ बनती हैं, जबकि मेयोसिस प्रजनन के लिए चार आनुवंशिक रूप से अद्वितीय कोशिकाएँ पैदा करता है। बहुकोशिकीय जीवों में वृद्धि, ऊतक मरम्मत और अलैंगिक प्रजनन के लिए माइटोसिस महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 5. प्रकाश संश्लेषण क्या है ?

उत्तर - प्रकाश संश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पौधे सूर्य के प्रकाश, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड को ग्लूकोज और ऑक्सीजन में परिवर्तित करते हैं।

प्रश्न 6. फूल वाले पौधों में भ्रूण थैली कैसे बनती है ?

उत्तर - भ्रूण थैली मेगागैमेटोजेनेसिस नामक प्रक्रिया के माध्यम से बनती है, जिसमें एक मेगास्पोर बीजांड के भीतर मादा गैमेटोफाइट में विकसित होता है।यह प्रक्रिया पौधों के प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण है और इसमें जटिल कोशिकीय विभेदन शामिल है।

 मानव जीव विज्ञान FAQs

 प्रश्न 7. मानव शरीर का सबसे बड़ा अंग कौन सा है ?

उत्तर - त्वच मानव शरीर कासबसे बड़ा अंग है। त्वचा न केवल आंतरिक अंगों की रक्षा करती है, बल्कि शरीर के तापमान को विनियमित करने और संवेदी रिसेप्टर्स को आवास देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 8. मानव शरीर में कितनी हड्डियाँ होती हैं ?

उत्तर - एक वयस्क मनुष्य में 206 हड्डियाँ होती हैं।

प्रश्न 9. हृदय का कार्य क्या है ?

उत्तर - हृदय पूरे शरीर में रक्त पंप करता है, ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति करता है।

प्रश्न 10. रक्त कोशिकाओं के मुख्य प्रकार क्या हैं ?

उत्तर - लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC), श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC), और प्लेटलेट्स।

प्रश्न 11. रक्त को छानने के लिए कौन सा अंग जिम्मेदार है ?

उत्तर - गुर्दे रक्त से अपशिष्ट को छानते हैं और द्रव संतुलन को नियंत्रित करते हैं।

प्रश्न 12. एंजाइम क्या हैं ?

उत्तर - एंजाइम जैविक उत्प्रेरक हैं जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं को गति देते हैं। वे प्रक्रिया में उपभोग किए बिना, जीवन के लिए पर्याप्त दर पर महत्वपूर्ण जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं को सक्षम करते हैं।

प्रश्न 13. कोशिका में राइबोसोम क्या कार्य करते हैं ?

उत्तर - राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण के लिए जिम्मेदार होते हैं। वे मैसेंजर आरएनए को प्रोटीन में परिवर्तित करते हैं, जो शरीर के ऊतकों और अंगों की संरचना, कार्य और विनियमन के लिए आवश्यक हैं।

प्रश्न 14. कौन सा pH मान एक तटस्थ विलयन को परिभाषित करता है ?

उत्तर - pH 7, pH स्केल 0 (अम्लीय) से लेकर 14 (बेसिक) तक होता है, जिसमें pH 7 तटस्थ होता है। यह जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान दोनों में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।

आनुवंशिकी और विकास संबंधी FAQs

प्रश्न 15. आनुवंशिकी के जनक के रूप में किसे जाना जाता है ?

उत्तर - ग्रेगर मेंडल को , जिन्होंने वंशानुक्रम के सिद्धांतों की खोज की। मटर के पौधों के साथ मेंडल के प्रयोगों ने विरासत के नियमों की नींव रखी, जो आधुनिक आनुवंशिकी के लिए केंद्रीय हैं।

प्रश्न 16. प्राकृतिक चयन क्या है ?

उत्तर - एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें जीव अपने पर्यावरण के लिए बेहतर रूप से अनुकूलित होते हैं और जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं। प्राकृतिक चयन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने पर्यावरण के लिए बेहतर रूप से अनुकूलित होते हैं और अधिक सफलतापूर्वक जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं। यह तंत्र विकासवादी सिद्धांत की आधारशिला है, जो समय के साथ प्रजातियों के अनुकूलन और विकास को संचालित करता है।

प्रश्न 17. उत्परिवर्तन क्या है ?

उत्तर - डीएनए अनुक्रम में परिवर्तन जो आनुवंशिक भिन्नता को जन्म दे सकता है। उत्परिवर्तन लक्षणों में भिन्नता ला सकते हैं और विकास में एक प्रेरक शक्ति हैं, हालांकि वे कभी-कभी आनुवंशिक विकारों का कारण बन सकते हैं।

प्रश्न 18. जीनोटाइप और फेनोटाइप में क्या अंतर है ?

उत्तर - जीनोटाइप आनुवंशिक संरचना को संदर्भित करता है, जबकि फेनोटाइप अवलोकनीय लक्षण है।

प्रश्न 19. आरएनए का कार्य क्या है ?

उत्तर - आरएनए प्रोटीन संश्लेषण में मदद करता है और कुछ वायरस में आनुवंशिक जानकारी ले जाता है।

पारिस्थितिकी और पर्यावरण FAQs

प्रश्न 20. पारिस्थितिकी तंत्र क्या है ?

उत्तर - अपने पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया करने वाले जीवों का समुदाय। एक पारिस्थितिकी तंत्र जीवित जीवों का एक समुदाय है जो एक दूसरे के साथ और अपने भौतिक पर्यावरण के साथ बातचीत करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र छोटे तालाबों से लेकर विशाल जंगलों तक हो सकते हैं और पोषक चक्रण और ऊर्जा प्रवाह जैसी प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक हैं।

प्रश्न 21. जैव विविधता क्या है ?

उत्तर - एक पारिस्थितिकी तंत्र में जीवन रूपों की विविधता। जैव विविधता किसी दिए गए पारिस्थितिकी तंत्र, क्षेत्र या पूरी पृथ्वी पर जीवन रूपों की विविधता को संदर्भित करती है। जैव विविधता का उच्च स्तर पारिस्थितिकी तंत्र के लचीलेपन, उत्पादकता और ग्रह के समग्र स्वास्थ्य में योगदान देता है।

प्रश्न 22. ग्लोबल वार्मिंग का कारण क्या है ?

उत्तर - कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि वायुमंडल में गर्मी को रोकती है।

प्रश्न 23. नाइट्रोजन चक्र क्या है ?

उत्तर - एक प्रक्रिया जिसमें नाइट्रोजन को जीवन के लिए आवश्यक विभिन्न रूपों में परिवर्तित किया जाता है।

प्रश्न 24. आक्रामक प्रजाति क्या है ?

उत्तर - एक गैर-देशी प्रजाति जो देशी जीवों को पछाड़कर पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित करती है।

ये FAQ मौलिक जैविक अवधारणाओं का एक ठोस अवलोकन प्रदान करते हैं और परीक्षाओं की तैयारी करते समय आपकी समझ को मजबूत करने के लिए बहुत सटीक हैं।

कंप्यूटर प्रश्न उत्तर भाग 1 (Computer Question Answer Part 1)

कंप्यूटर प्रश्न उत्तर भाग 1 (Computer Question Answer Part 1)

 

बाल विकास : एक सामान्य परिचय (Child Development : A General Introduction)

बाल विकास : एक सामान्य परिचय (Child Development : A General Introduction)

विकास की परिभाषा (Definition of Development)

विकास शब्द का तात्पर्य वृद्धि के साथ-साथ होने वाले विभिन्न गुणात्मक और मात्रात्मक परिवर्तनों से है। इसलिए, विकास को व्यवस्थित और सुसंगत परिवर्तनों की एक प्रगतिशील श्रृंखला के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
विकास शब्द वृद्धि से संबंधित परिवर्तनों और परिपक्वता की ओर बढ़ने को इंगित करता है। दूसरे शब्दों में, विकास को किसी व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्थिति में वृद्धि के रूप में वर्णित किया जा सकता है।
विकास की प्रक्रिया में, नई क्षमताएँ और विशेषताएँ प्रकट होती हैं और व्यक्ति के व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन होता है।
विकास जीवनपर्यन्त चलने वाली एक निरन्तर प्रक्रिया है। विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक, क्रियात्मक, संज्ञानात्मक, भाषागत, संवेगात्मक एवं सामाजिक विकास होता है।
उम्र के साथ बच्चे में गुणात्मक और मात्रात्मक परिवर्तन आम तौर पर देखे जाते हैं। बच्चे में क्रमिक और सुसंगत विकास की श्रृंखला को 'विकास' कहा जाता है। 'सुसंगत' होना यह दर्शाता है कि बच्चे के विकास में गुणात्मक परिवर्तन और उसमें भविष्य के विकास के बीच एक निश्चित संबंध है। भविष्य में होने वाले परिवर्तन अब तक की प्रगति पर निर्भर करते हैं।
जेई एंडरसन के अनुसार, "विकास वृद्धि के साथ-साथ व्यवहार में उन परिवर्तनों से संबंधित है जो पर्यावरणीय परिस्थितियों के परिणामस्वरूप होते हैं"
अरस्तू के अनुसार, "विकास आन्तरिक एवं बाहरी कारणों से व्यक्ति में परिवर्तन है।”


विकास की विशेषताएँ (Characteristics of Development)

विकास एक आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है जो गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक जारी रहती है। मनोवैज्ञानिकों ने विकास की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन किया है, जो इस प्रकार हैं -

1. विकास की प्रक्रिया गर्भाधान के क्षण से लेकर व्यक्ति के परिपक्व होने तक जारी रहती है।
2. विकास एक व्यवस्थित तरीके से होता है और एक निश्चित क्रम का पालन करता है। मानव में विकास की प्रक्रिया में निम्नलिखित क्रम का पालन किया जाता है -शैशवावस्था - प्रारंभिक बाल्यावस्था - उत्तर बाल्यावस्था - किशोरावस्था - परिपक्वता
3. विकासात्मक परिवर्तन आमतौर पर व्यवस्थित, प्रगतिशील और नियमित होते हैं। वे आम तौर पर एक अनुक्रम का पालन करते हैं, सामान्य से विशिष्ट की ओर, सरल से जटिल की ओर और एकीकृत से कार्यात्मक स्तरों की ओर बढ़ते हैं।
4. विकास गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों होता है। जैसे-जैसे बच्चा शारीरिक रूप से बढ़ता है, उसके व्यक्तित्व के गुणात्मक पहलू भी विकसित होते हैं। इस प्रकार, ये दोनों पहलू अविभाज्य हैं।
5. मानव वृद्धि और विकास बहुत जटिल घटना है। यह कई कारकों से प्रभावित होता है, जैसे शारीरिक बुद्धि, लिंग आदि।
6. धीमी गति से सीखने वाले और बेहतर बच्चे को देखकर विकास की दर का अनुमान लगाना संभव है, लेकिन इसका सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
7. व्यक्ति अपने पैटर्न और विकास की दर में एक दूसरे से भिन्न होते हैं। व्यक्तिगत अंतर आनुवंशिकता, उपहार और पर्यावरण प्रभावों में अंतर के कारण होते हैं।
8. विकास एक गतिशील प्रक्रिया है। इसकी प्रकृति बहते पानी की तरह है। इसमें विभिन्न कारकों की मदद से बच्चे का सर्वांगीण विकास होता है। विकास की इस प्रक्रिया में रुचि, आदतें, दृष्टिकोण, जीवन मूल्य, स्वभाव, व्यक्तित्व, व्यवहार आदि का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
9. विकास बहुआयामी होता है अर्थात कुछ क्षेत्रों में तेजी से विकास होता है जबकि अन्य में धीमी गति से।
10. विकास बहुत लचीला होता है, जिसका अर्थ है कि एक ही व्यक्ति अपनी पिछली विकास दर की तुलना में किसी विशेष क्षेत्र में अपेक्षाकृत तेजी से सुधार दिखा सकता है। एक अच्छा पर्यावरण शारीरिक शक्ति या स्मृति और बुद्धि के स्तर में अप्रत्याशित सुधार ला सकता है।
11. किशोरावस्था के दौरान शरीर के साथ-साथ भावनात्मक, सामाजिक और संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली में भी तेजी से बदलाव देखने को मिलते हैं।
12. विकास प्रासंगिक हो सकता है। यह ऐतिहासिक, पर्यावरणीय और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों से प्रभावित हो सकता है।
13. विकासात्मक परिवर्तनों की दर या गति में महत्वपूर्ण "व्यक्तिगत अंतर" हो सकते हैं। ये अंतर आनुवंशिक कारकों या पर्यावरणीय प्रभावों के कारण हो सकते हैं। कुछ बच्चे अपनी उम्र की तुलना में अत्यधिक संवेदनशील और सचेत हो सकते हैं, जबकि कुछ बच्चे बहुत धीमी गति से विकसित होते हैं। उदाहरण के लिए, एक औसत बच्चा 3 साल की उम्र में 3-शब्द वाक्य बोलना शुरू कर देता है, कुछ बच्चे ऐसे भी हो सकते हैं जो 3 साल की उम्र से बहुत पहले ही यह क्षमता हासिल कर लेते हैं।


विकास के प्रकार (Types of Development)

विकास के प्रकार निम्नलिखित हैं -

1. शारीरिक विकास ( Physical Development) - यह बच्चे के जीवन में सबसे अधिक पहचाना जाने वाला और देखने योग्य परिवर्तन है। इसमें सकल मोटर कौशल, जैसे चलना, कूदना, पकड़ना आदि और पेंटिंग, लेखन, ड्राइंग आदि के लिए बढ़िया मोटर कौशल शामिल हैं। यह विकास काफी हद तक बच्चे के स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति पर निर्भर करता है। इस विकास को परिपक्वता भी कहा जाता है। शारीरिक विकास के तहत शरीर के बाहरी परिवर्तन जैसे लंबाई का बढ़ना, शारीरिक अनुपात आदि जो स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं, लेकिन शरीर के आंतरिक अंगों में होने वाले परिवर्तन स्पष्ट नहीं होते और बाहरी रूप से दिखाई नहीं देते, लेकिन शरीर के अंदर उनका समुचित विकास होता रहता है।
2. संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) - यह इस बात पर केंद्रित है कि बच्चे कैसे सीखते हैं और जानकारी को संसाधित करते हैं। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वे अपनी इंद्रियों (जैसे देखना, सुनना, छूना, सूंघना और चखना) का उपयोग करके अपने पर्यावरण को समझ सकते हैं, अपने दिमाग में जानकारी दर्ज कर सकते हैं और इसे अपनी याददाश्त से कुशलतापूर्वक पुनः प्राप्त कर सकते हैं। यह विकास बुद्धि के विकास को दर्शाता है। संज्ञानात्मक या मानसिक विकास बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं और क्षमताओं में वृद्धि से है जिनके परिणामस्वरूप वह विभिन्न प्रकार की समस्याओं को हल करने में सक्षम होता है। कल्पना करने, याद रखने, सोचने, निरीक्षण करने, समस्या समाधान करने, निर्णय लेने आदि की क्षमता संज्ञानात्मक विकास के फलस्वरूप विकसित होती है। जन्म के समय बच्चे में यह क्षमता नहीं होती, लेकिन धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ-साथ मानसिक विकास की गति भी बढ़ती जाती है।
3. सामाजिक विकास (Social Development) - ये बच्चों में अच्छे सामाजिक विकास के संकेतक हैं। इस सामाजिक व्यवहार के बीज बचपन में ही बो दिए जाते हैं। छोटे बच्चे अपने दोस्तों की संगति का भी आनंद लेते हैं। वे अपने साथियों और अन्य लोगों के साथ बातचीत में साझा करने, सहयोग करने, धैर्य रखने आदि जैसे सामाजिक कौशल विकसित करते हैं। हरलॉक के अनुसार, "सामाजिक विकास का अर्थ है सामाजिक अपवादों के अनुसार कार्य करने की क्षमता प्राप्त करना"। सामाजिक विकास का शाब्दिक अर्थ है - समाज के भीतर रहना और विभिन्न पहलुओं को सीखना। चरित्र निर्माण, अच्छा व्यवहार (सद्गुण) और जीवन से संबंधित व्यावहारिक शिक्षा आदि समाज के भीतर विकसित होती है। बच्चों के विकास के लिए परिवार को पहली पाठशाला माना जाता है, उसके बाद समाज आता है। सामाजिक विकास के माध्यम से बच्चों की भागीदारी व्यापक होती है। रिश्तों के दायरे का विस्तार होता है यानी बच्चा माता-पिता और भाई-बहनों के दोस्तों/मित्रों से जुड़ता है।
4. भावनात्मक विकास (Emotional Development) - भावनाएँ मन की उत्तेजित या प्रेरित अवस्था होती हैं और किसी व्यक्ति की भावनाओं में उत्तेजना या अशांति होती हैं। भावनात्मक विकास किसी की भावनाओं को नियंत्रित करने और प्रबंधित करने की क्षमता है। यह महत्वपूर्ण है कि बचपन में बच्चे ऐसे लोगों से घिरे हों जो भावनात्मक रूप से परिपक्व और स्थिर हों और अपनी भावनाओं को प्रबंधित करने में सक्षम हों। भावनाएँ ऐसी स्थितियाँ हैं जो किसी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, खुशी आदि भावनाओं के उदाहरण हैं। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, ये भावनाएँ विकसित होती जाती हैं। भावनात्मक विकास मानव वृद्धि और विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू है। एक बच्चे का भावनात्मक व्यवहार न केवल उसके शारीरिक विकास को प्रभावित करता है, बल्कि उसके बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है। बच्चे का भावनात्मक विकास उसके संतुलित विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पारिवारिक वातावरण का भी बच्चे के भावनात्मक विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता है। स्कूल के वातावरण और गतिविधियों को उचित ढंग से व्यवस्थित करके शिक्षक बच्चों के भावनात्मक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
5. भाषा विकास (Language Development) - भाषा संचार का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। भाषा संचार का एक रूप है जो विचारों, इच्छाओं और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों और प्रतीकों का उपयोग करती है। भाषा के माध्यम से बच्चा अपने विचारों एवं भावनाओं को दूसरों के समक्ष व्यक्त करता है तथा दूसरों के विचारों एवं भावनाओं को समझता है। भाषाई ज्ञान में बोलकर विचार व्यक्त करना, संकेतों द्वारा विचार व्यक्त करना और विचार लिखकर व्यक्त करना शामिल है। 6 महीने से 1 साल की उम्र के बीच बच्चा कुछ शब्द बोलना और समझना शुरू कर देता है। 3 साल की उम्र में वह कुछ छोटे-छोटे वाक्य बोलना शुरू कर देता है। भाषाई विकास के माध्यम से कौशल में वृद्धि होती है।
6. नैतिक विकास (Moral Development) - नैतिक विकास नैतिकता या नैतिक मानदंडों के विकास से संबंधित है, विवेक को महत्व देना और किसी कार्य को नैतिक रूप से आंकने की क्षमता। बच्चे तब तक नैतिक निर्णय नहीं ले सकते जब तक कि वे संज्ञानात्मक परिपक्वता का एक निश्चित स्तर प्राप्त नहीं कर लेते।


वृद्धि की परिभाषा (Definition of Growth)

वृद्धि का अर्थ है मानव शरीर के विभिन्न अंगों का विकास और उन अंगों की कार्य करने की क्षमता। शारीरिक वृद्धि हमारे व्यवहार को प्रभावित करती है । इस प्रकार, वृद्धि का अर्थ है आकार और वजन में वृद्धि, जिसमें मांसपेशियों की वृद्धि भी शामिल है। हर्बर्ट सेवेनसन शारीरिक वृद्धि को 'बड़ा और भारी' कहते हैं। दूसरे शब्दों में, वृद्धि का अर्थ है वजन, ऊंचाई में वृद्धि और शरीर के अनुपात में परिवर्तन। वृद्धि केवल शारीरिक पहलू में होती है। वृद्धि मात्रात्मक परिवर्तनों को भी संदर्भित करती है जैसे कि यह मापना संभव है कि एक निश्चित समय अवधि में एक बच्चा कितना लंबा हो गया है। वृद्धि का अर्थ होता हैं बालकों की शारीरिक संरचना का विकास जिसके अन्तर्गत लम्बाई, भार, मोटाई तथा अन्य अंगों का विकास आता है। वृद्धि की प्रक्रिया आन्तरिक एवं बाह्य दोनो रूपों में होती है, यह एक निश्चित आयु तक होती है तथा भौतिक पहलू में ही सम्भव है। वृद्धि पर आनुवंशिकता का सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।


वृद्धि और विकास के बीच तुलनात्मक अंतर (Comparative Difference Between Growth and Development)

वृद्धि और विकास को अक्सर एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है क्योंकि ये दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से संबंधित और निर्भर हैं। किसी व्यक्ति के विकास में दोनों का अलग-अलग योगदान निर्धारित करना कठिन है, लेकिन मनोवैज्ञानिकों ने इन दोनों प्रक्रियाओं के बीच कुछ अंतर बताए हैं जो इस प्रकार हैं -

 

वृद्धि और विकास के बीच तुलनात्मक अंतर
वृद्धि (Growth) विकास (Development)
1. वृद्धि विकास की प्रक्रिया में एक चरण है। इसका दायरा सीमित है। 1. विकास शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जाता है। वृद्धि इसका एक हिस्सा है। विकास व्यक्ति में होने वाले सभी परिवर्तनों को प्रकट करता है।
2. वृद्धि की प्रक्रिया जीवन भर जारी नहीं रहती है, यह बच्चे के परिपक्व होते ही रुक जाती है। 2. विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और यह बच्चे के परिपक्व होने के बाद भी जारी रहती है।
3. वृद्धि शब्द का प्रयोग केवल मात्रात्मक परिवर्तनों के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ आकार, लंबाई, ऊंचाई और वजन में जो परिवर्तन होता है उसे वृद्धि कहा जाता है। 3. विकास शब्द का प्रयोग मात्रात्मक परिवर्तनों के साथ-साथ व्यवहारिक परिवर्तनों के लिए भी किया जाता है। जिसके फलस्वरूप बच्चे की कार्यक्षमता, कार्यकुशलता तथा व्यवहार में उन्नति होती है।
4. वृद्धि के परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तन आम तौर पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इन्हें अच्छे से मापा भी जा सकता है। 4. विकास के परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों को सीधे तौर पर मापना कठिन है। इन्हें केवल अप्रत्यक्ष तरीकों से ही मापा जा सकता है, जैसे व्यवहार का अवलोकन आदि।

बाल विकास और शिक्षाशास्त्र परीक्षण श्रृंखला 1 (Child Development & Pedagogy MCQ Test Series 1)

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हिन्दी प्रश्न उत्तर भाग 1 (Hindi Question Answer Part 1)

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